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रविवार, 12 जून 2011

ham bharatya aaj bhee rail ke dibbe hain

 हम भारतीय आज भी रेल के डिब्बे ही हैं

एक लाइन थी जो मुझे आज बरबस याद आ गयी कि ‘हम भरतीय रेल के डिब्बे हैं‘।  यह लाइन आज के परिदृश्य में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी तब थी। यह लाइन थी भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के एक निबन्ध की जिसे मैने 11वीं में पढ़ा था, नाम था ‘भारतवर्षोंन्नति कैसे हो‘। आजादी के पहले अंग्रेज हमारे लिए इंजन थे। आजादी की लड़ाई में लाठी हमारे लिए इंजन का काम करती रही। उसने हमे खींचा तब हम गुलामी से मुक्त हो सके।
चलो आजाद हो गए तो सोचा अब ‘बस‘ बन जाएंगे पर सोच गलत थी हम रेल के डिब्बे ही रह गए। ये अलग बात थी अब हमें कोई विदेशी इंजन नहीं खींच रहा था। फिर भी शर्म न आई। इमरजेंसी लगी, सारे अधिकारों पर ताला लगा। अब भी हम ‘लोकनायक‘ का इन्तजार करते रहे कि वे आएंगे और वे हमे खीचेंगे। खैर भला हो उनका उन्होने अपने नैतिक कर्तव्य को समझा आगे इंजन की तरह वे आगे लग गए और हम डिब्बे की तरह उनके पीछे लग लिए।
अब हम इस त्रासदी से भी मुक्त हो चुके थे, अब कहा जा सकता है कि नया दौर शुरू हो चुका था सोचा कि इस बार इनबिल्ट इंजन लगा लेंगे या हवाई जहाज हो जाएंगे, उड़ेंगे नीले गगन पे। यह विचार भी रद्दी के भाव बिक गया हम जहाज से तो जरूर उड़ने लगे पर हम अब भी अपनी बात कहने के लिए इसी प्रकार के इंजनो की तलाश में लगे रहे। पर अब तो ‘अन्ना‘ आ गए हमने उन्हे पकड़ लिया, पर स्वयं की प्रेरणा अन्ना के जगाने पर ही विकसित कर पाए। अब हमे अन्ना ढो रहे हैं, भ्रष्टाचार से लड़ रहे हैं। चलिए कम से कम से कम हममें निष्क्रियता तो नही आयी खींचे जाने पर आराम से चले जाते हैं। अभी पहियों में जंग तो नहीं लगी है, इसी से संतोष कर लिया जाए। क्या करें ? हम भारतीयों में संस्कृत की एक उक्ति प्रचलित हैए ‘संतोषं परम् सुखम‘ उसी से प्रेरणा लेते रहते हैं, संतोष कर लेते है। अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए कोई लाठी, कोई लोकनायक, कोई अन्ना तो ढॅूढ़ ही लेंगे पर खुद को तैयार न कर सकेंगे।
अब बाबा को भी इंजन बन हमें खींचना पड़ रहा है, काले धन पर वे अपना योग, ध्यान सब छोड़कर हमारे लिए इंजन बन गए हैं। खैर वो भी अपना कर्तव्य निभा देंगे और हम रेल के डिब्बों की तरह उनके पीछे लग लेंगे। हम अपने लिए न लड़ सकेंगे पर किसी के पीछे चल लेंगे। दूसरे का इंतजार करते रहेंगे कि कोई आएगा और हमारे अधिकारों के लिए लड़ेगा। भारतेन्दु ठीक कहते है हमसे तो इस मामले मे अंग्रेज ही बेहतर हैं वो कम से कम अपने लिए तो लड़ ही लेते हैं। हमारी तरह पिछलग्गू तो नहीं हैं।हम वाकई में डिब्बा बन कर रह गए हैं।

               

शुक्रवार, 3 जून 2011

फटीचर हिंदी - मेरी कलम की बगावत

फटीचर हिंदी & मेरी कलम की बगावत
मेरी कलम उठ गयी, वह दौड़ने लगी जैसे टॉम को देखकर जेरी भागता है। न जाने कहॉ से मेरे दिमाग में फटीचर हिन्दी लेखन का भाव जाग गया। वास्तव में मै अच्छी व रौबदार हिन्दी लिखने का प्रयास कर रहा था। मेरी कलम ने विद्रोह का बिगुल बजा दिया। जैसे घर के संस्कारों के बोझ तले दबे युवा अक्सर ऐसा करते हैं। मेरे दिमाग ने भी उसका साथ दिया। मेरी हालत मोरारजी देसाई जैसी हो गयी जब मंत्रिमंडल के ही सदस्य सरकार को अस्थिर करने लगे या आप यॅू कह सकते हैं कि मै उस समय अमर सिंह जैसा हो गया जो अब न किसी घर का है न ही किसी घाट का है। सो मैने कलम और दिमाग के सामने मुक्ति संग्राम में हारी हुयी पाकिस्तानी सेना की तरह आत्म समर्पण करना ज्यादा उचित समझा।
मै रौबदार हिंदी जिसे हम साहित्यिक भी कहते हैं, का ऐसा भक्त बन गया था कि मुझे इसके अलावा कुछ नजर ही नहीं आ रहा था। परिणाम स्वरुप मैं हिन्दी के भारी भरकम साहित्य का अध्ययन करने लगा। मैने न जाने कितने पहुॅचे साहित्यकारों को अपना मार्ग दर्शक बना बैठा था। वो तो ऊपर से मजा ले रहे थे। मैं उनका अनुयायी बनकर उनके द्वारा बुने गये समीकरणों में फॅसता जा रहा था। मेरी कलम मेरा सामंती रवैया बर्दाश्त न कर सकी। दिमाग भी भारी भरकम साहित्य के सामने तराजू के दस ग्राम के बाट की तरह था। मेरा दिमाग तो मेरी इस अन्ध भक्ति से ऊब चुका था। मेरे डर से कुछ बोलने का साहस न कर पाता था, सो उसने अंग्रेजों की तरह इन्तजार करना उचित समझा। मौका आने पर उसने भी चौका मारे में देरी नहीं की। मुझे सम्हलने का मौका तक न मिला।
मुझे गुस्सा भी बहुत आया पर मैने मनमोहन सिंह की तरह अपनी गलती स्वीकार कर सहानुभूति की लहर पैदा करने की कोशिश भी की पर मेरी कलम मेरी रौबदार हिंदी की कब्र खद चुकी थी। मैने समझौता कर मजार बना दी। अब शरीया को यह मंजूर न था, उसने मुझे काफिर घोषित करा दिया। मैं तो डर गया मैने कलम के ही खेमे में अपना भविष्य सुरक्षित समझा। मैं अवसरवादी नहीं था। मैं मजबूर था। इसके बाद मेरे शरीर के सभी अंगों ने मेरे इस फैसले पर जश्न मनाया।
लेकिन मुझे मेरी गलती का अहसास हुआ। अब मेरा नया जीवन शुरु हो रहा था। अब मैं रौबदार हिंदी की रौब नहीं सुनूॅगा। वैसे तो मैं सूफी सन्तों की ही तरह था। फटीचरी में तो हम एक्सपर्ट थे किन्तु रौबदार हिंदी की गुलामी ने तो वेश भूषा भी बदल दी थी। मै भी अंग्रेजों के गुलाम भारतीयों की तरह सूट-बूट-टाई में आ गया था। रौबदार हिंदी का सारा वनज मेरी टाई पर था जो मुझे झुकाये जा रहा था। यह बात मुझे देर से समझ आई कि यह राजसी हिंदी मेरे लिये नहीं बनी हैे। इसके लिये मै अपनी कलम का आभारी भी हॅू।
इस घटना के बाद तो मेरा दिल कुलॉचे मार कर कूद रहा था। उसके लिये तो यह खुशी तो 15 अगस्त 1947 जैसी थी। वह खुश था कि अब वह फ्लर्ट भी कर सकता था। अब उसे प्रियतम और सखे कहकर पुरानी हिंदी फिल्मों की तरह डायलॉग नहीं मारना पड़ेगाए न ही उसे अब स्लोमोशन मेें पुराने हिंदी गानों पर स्लोमोशन नृत्य करना पड़ेगा। अब वह पॉप कल्चर को अपना गुरू बना चुका है। अब उसके पास डार्लिंग और जानू जैसे शब्द हैं। अब वह अपनी प्रियतम को मुन्नी-शीला कहकर चिढ़ा सकता था। अब वह देवदास नहीं था अब वह रेमो बन चुका था। अब मेरा मन भी मेरे दिल के साथ टहलने जा सकता था। अब वह इस संसार के सारे मजे लूट सकता था जो वह अब तक न लूट सका था।
जो लक्षमण रेखा इन तथाकथित रौबदार शासकों ने खींची थी अब मै उसे लॉघ चुका था। मैं मैकाले की शिक्षा के जाल में फॅसा था जिसके कारण मैं इन रौबदरियों का मुंशी बन गया था। आज मेरी कलम ने मझे आत्म बोध कराया था। उसने मुझे इस गुलामी से मुक्त कराया। मुझे रौबदार संप्रदाय में जाने से रोका। मेरे शरीर में भारत की तरह लोकतंत्र की स्थापना करायी। अब मैं फटीचर हिंदी में अपना भविष्य सुरक्षित कर सकूॅगा।