हम भारतीय आज भी रेल के डिब्बे ही हैं
एक लाइन थी जो मुझे आज बरबस याद आ गयी कि ‘हम भरतीय रेल के डिब्बे हैं‘। यह लाइन आज के परिदृश्य में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी तब थी। यह लाइन थी भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के एक निबन्ध की जिसे मैने 11वीं में पढ़ा था, नाम था ‘भारतवर्षोंन्नति कैसे हो‘। आजादी के पहले अंग्रेज हमारे लिए इंजन थे। आजादी की लड़ाई में लाठी हमारे लिए इंजन का काम करती रही। उसने हमे खींचा तब हम गुलामी से मुक्त हो सके।
चलो आजाद हो गए तो सोचा अब ‘बस‘ बन जाएंगे पर सोच गलत थी हम रेल के डिब्बे ही रह गए। ये अलग बात थी अब हमें कोई विदेशी इंजन नहीं खींच रहा था। फिर भी शर्म न आई। इमरजेंसी लगी, सारे अधिकारों पर ताला लगा। अब भी हम ‘लोकनायक‘ का इन्तजार करते रहे कि वे आएंगे और वे हमे खीचेंगे। खैर भला हो उनका उन्होने अपने नैतिक कर्तव्य को समझा आगे इंजन की तरह वे आगे लग गए और हम डिब्बे की तरह उनके पीछे लग लिए।
अब हम इस त्रासदी से भी मुक्त हो चुके थे, अब कहा जा सकता है कि नया दौर शुरू हो चुका था सोचा कि इस बार इनबिल्ट इंजन लगा लेंगे या हवाई जहाज हो जाएंगे, उड़ेंगे नीले गगन पे। यह विचार भी रद्दी के भाव बिक गया हम जहाज से तो जरूर उड़ने लगे पर हम अब भी अपनी बात कहने के लिए इसी प्रकार के इंजनो की तलाश में लगे रहे। पर अब तो ‘अन्ना‘ आ गए हमने उन्हे पकड़ लिया, पर स्वयं की प्रेरणा अन्ना के जगाने पर ही विकसित कर पाए। अब हमे अन्ना ढो रहे हैं, भ्रष्टाचार से लड़ रहे हैं। चलिए कम से कम से कम हममें निष्क्रियता तो नही आयी खींचे जाने पर आराम से चले जाते हैं। अभी पहियों में जंग तो नहीं लगी है, इसी से संतोष कर लिया जाए। क्या करें ? हम भारतीयों में संस्कृत की एक उक्ति प्रचलित हैए ‘संतोषं परम् सुखम‘ उसी से प्रेरणा लेते रहते हैं, संतोष कर लेते है। अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए कोई लाठी, कोई लोकनायक, कोई अन्ना तो ढॅूढ़ ही लेंगे पर खुद को तैयार न कर सकेंगे।
अब बाबा को भी इंजन बन हमें खींचना पड़ रहा है, काले धन पर वे अपना योग, ध्यान सब छोड़कर हमारे लिए इंजन बन गए हैं। खैर वो भी अपना कर्तव्य निभा देंगे और हम रेल के डिब्बों की तरह उनके पीछे लग लेंगे। हम अपने लिए न लड़ सकेंगे पर किसी के पीछे चल लेंगे। दूसरे का इंतजार करते रहेंगे कि कोई आएगा और हमारे अधिकारों के लिए लड़ेगा। भारतेन्दु ठीक कहते है हमसे तो इस मामले मे अंग्रेज ही बेहतर हैं वो कम से कम अपने लिए तो लड़ ही लेते हैं। हमारी तरह पिछलग्गू तो नहीं हैं।हम वाकई में डिब्बा बन कर रह गए हैं।
yah waakai sahi hai
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